बच्चो के व्यक्तित्व का विकास कैसे करे। पार्ट 1

अपने बच्चो का विकाश कैसे करे। अपने बच्चो को कोनसी शिक्षा दे जिससे बच्चे शिष्टाचारी हो ।
ये बच्चो माता पिता पर ही निर्भर होता है। कहते है माँ बच्चे कि पहली गुरू होती है ।जो अपनी
कोख मे बच्चे को 9 महिने रख कर उसका लालन पालन  करती है।वो अपने बच्चे के हर सुख
दु:ख कि परवा करती है।माँ अपने बच्चे के निर्माण करने के संबंध मे अपने कर्तव्यो को  पाँच।।
 वर्ष तक पुरा कर लेती है पेट मे जिस दिन से बच्चा आता है ।उसी दिन से माँ का कर्तव्य शुरू हो
जाता है।बालक का स्वास्थ्य और बालक का मस्तिष्क विकास के लिये अपने चिन्तन और उसको।
आहार विहार मे जिस तरह संयम बरतना चाहिये ,यह क्रिया पाँच साल तक जारी रहती है।क्योकि
माता पिता का हि बच्चे से सबसे अधिक संबंध रहता है।मा के पास वह स्वयं रहता है।खेलता भी
वह मा के पास है ,माता का सबसे ज्यादा प्रभाव बच्चे पर तब तक होता है ,जब तक उसकि उम्र पाँच
की होती है।पाँच साल के बाद शिक्षण कि जवाबदारी दुसरे लोगो के कंधो पर चली जाती है।जो कि
अभिभावको कि होती है। जिसमे पिता मुख्य है।,
शिक्षण भले हि विधालय मे हो, परंन्तु व्यक्तिव का निर्माण घर कि पाठशाला मे हि होता है। घर को
 एक पाठशाला के रूप मे विकसित करना चाहिये, अगर आप को भावी पिडी को अच्छा बनाना है
तो माता को अपना स्वभाव, पिता को अपना स्वभाव ,घर के बाकी सदस्यो को घर के वातावरण
 को ऐसे गिली मिट्टी के सांचे की तरह बनाना चाहिये जिसमे बालक ढलता ही जाये,।मान लो लोहे
कि गोलिया ढालनी है। तो उसकी सारी मशीने ,ढाचा और डाईया ऐसी बनाई जायेगी ,जो पिगला
हुआ लोहा जहा से भी जाये जिस नाली में होकर के जाये,बस वो गोली में बदलता हुआ चला जाये
निचे निकलता चला जाये। अगर मशीन में नुक्स हुआ और मशीन ठीक नही होगी,तो गोलिया साफ
नही निकलेंगी,टेडी हो जायेगी और खराब हो जायेंगी। बच्चे को किस तरिके से बनाया जाना है,?

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